15 May 2012

सवाल ही सवाल???



...और नक्सली घटनाएं हो रहीं हैं। एक तरफ सरकार नक्सलियों से बात करने का दावा कर रही है। सरकार की बनाई हाईपावर कमेटी नक्सलियों की रिहाई के रास्ते तलाश करने में जुटी है तो दूसरी ओर नक्सली बुलेट का साथ छोड़ ही नहीं रहे हैं। रविवार को मदर्स डे था। मदर्स डे के दिन कई मांओं की गोदें सूनी हो गईं। ये कैसी बातचीत है? ये कैसी शांति है?
छत्तीसगढ़ किस दिशा में जा रहा है। नक्सली एक कलेक्टर को उठाकर ले जाते हैं। पूरा प्रदेश, पूरा देश हिल जाता है। सरकार नक्सलियों के सामने गिड़गिड़ाती नजर आती है।  करीब पखवाड़े भर हाईप्रोफाइल ड्रामा चलता है।  दिगर जगहों से आयातित कर वार्ताकार बुलाए जाते हैं। ये वार्ताकार नक्सलियों की मांद तक पहुंच जाते हैं। सरकार नहीं पहुंच पाती। सरकार के सुरक्षा बल नहीं पहुंच पाते। आम आदमी जानना चाहता है आखिर छत्तीसगढ़ में किसकी सरकार है?
क्या आम छत्तीसगढिय़ा ये मान ले कि उसे दो सरकारें मिली हैं। एक सरकार जो बैलेट के माध्यम से आई है और दूसरी सरकार जो बुलेट से चल रही है। बस्तर के कुछ इलाकों में बैलेट के जरिए आने वाली सरकार मेमने की तरह होती है। जंगल में शेर की तरह यहां का राजा बुलेट के जरिए सरकार चलाता है। संघ के समय से भगवा पार्टी में रहे और अब भाजपा से किनारा कर चुके एक नेता व्यंग्य करते हैं कि बस्तर में नक्सली हमले के बाद मुख्यमंत्री आवास की दीवारें कुछ इंच ऊंची कर दी जाती हैं! मुख्यमंत्री और उनके सिपहसलार इस व्यंग्य पर खामोश क्यों हैं?
बड़ी खामोशी से नक्सली एक सलवा जुड़ूम कार्यकर्ता की हत्या कर देते हैं। पहले उसका अपहरण करते हैं। फिर जन अदालत लगाते हैं।  उसी सुकमा में जहां हाईप्रोफाइल ड्रामा खेला गया था। न कहीं कोई मोमबत्ती जलती है। न कहीं कोई रैली निकलती है। जी हरगोपाल, ब्रम्हदेव शर्मा, निर्मला बुच और सुयोग्य मिश्र भी नजर नहीं आते। सब अपने घरों में इस गरमी के मौसम में एयरकंडीशंड कमरों में आराम कर रहे होते हैं। पुनेम पोदिया एक आम इंसान था। कोई आईएएस थोड़ी था  जिसके लिए ये लोग धूप में जंगल की खाक छानते। मीडिया को भी पूनेम पोदिया कोई टीआरपी नहीं देता! इसलिए मीडिया भी आराम के मूड में थी। जाहिर है, एक आईएएस के अपहरण और रिहाई के बीच मीडिया को एक सुपर टीआरपीमामला मिल गया था, जब तक यह चला भुनाते रहे सब! खत्म हुआ तो सब लौट गए अपने ठिएं में, मानो कुछ दिन की पिकनिक मन गई! मीडिया के लिए यह रोमांचक कव्हरेज था लेकिन शायद ही कोई समझ सकता है कि बस्तर के लोगों के लिए उनका रोमांच हर दिन के जीने मरने जैसा है। बात हो रही थी, पुनेम पोदिया की। बेचारा फरवरी महीने से नक्सलियों के चंगुल में था। इस बीच के ड्रामे में  इसका कहीं नाम नहीं आया। इसका यही हाल होना था। हो गया। मारा गया। उधर एक के बाद एक नक्सलियों की रिहाई की कोशिशें हो रही हैं। नक्सली वारदात पर वारदात कर रहे हैं। सरकार शहीदों के शवों के लिए तिरंगे का आर्डर देने में ही लगी है! क्या उसका जमीर नहीं जगता?
बैलाडीला में जो सात जवान मारे गए, वो कौन थे? आम सिपाही। एक एएसआई गोलियों से भून दिया गया। उनकी मौत का किस पर असर पड़ा है। उन जवानों की मां, बहन, बच्चे, पिता पर। नक्सलियों से बातचीत चल रही है। रिहाई के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में इनका जाना क्या सरकार की कमजोरी और नक्सलियों की दादागिरी नहीं है? हर हादसे के बाद हादसे की निंदा का रटा-रटाया बयान जारी कर प्रदेश के मुखिया क्या अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं? क्या उनकी घटना की निंदा कर देने से जवान जिंदा लौट आ सकते हैं?
कब तक? आखिर कब तक? इस तरह की नक्सल वारदातें कब तक छत्तीसगढ़ को रूलाती रहेंगी? कब तक मांओं की गोदें सूनी होते रहेंगी? कब तक बहनें अपने भाईयों की कलाई के लिए तरसेंगी? कब तक एक पिता अपने बेटे की लाश को कांधे पर ढोने मजबूर होता रहेगा? कब तक कोई अबोध बच्चा अपने पिता के शव के आसपास लोगों को रोते देखते हुए सहमा सा रहेगा? कब तक हम इस तरह के हादसे के बाद अफसोस जाहिर  कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएंगे? क्या खून नहीं खौलता हमारा? या फिर इंतजार उस दिन का है जब हर घर में एक शहीद हो? क्या सरकार को शर्म नहीं आती? क्या सारे सवालों का जवाब किसी के पास है?????????

13 May 2012

मां..... जाने कहां गई

मार्च 1973 की तस्‍वीर। जब मैं दो महीने का था.... अपनी मां की गोद में। बगल में मेरा 2 साल का भाई बैठा है। यूं ही ननिहाल में पुराने एलबम पलटते समय बडे भाई को यह तस्‍वीर मिल गई और उसने मुझे भेज दिया। शायद मेरी मां के साथ मेरी यह इकलौती तस्‍वीर है........


मां। दुनिया का सबसे प्‍यारा शब्‍द। इस एक शब्‍द में सारी दुनिया समाई हुई है। दुनिया में कई रिश्‍ते होते हैं लेकिन शायद ही ऐसा कोई रिश्‍ता होगा जो सिर्फ एक अक्षर में सिमटा हो, लेकिन उस रिश्‍ते की ताकत दुनिया के हर रिश्‍ते से बडी होती है। भगवान का नम्‍बर भी शायद इस रिश्‍ते के बाद आता है। ये रिश्‍ता है मां का। 
मां। तुम बहुत याद आ रही हो। वैसे तो एक पल भी ऐसा नहीं बीता होगा जब तुम जेहन में न रहती हो... पर इंसानों के बनाए इस मदर्स डे में तुम्‍हारी याद और भी आ रही है और तुम्‍हे व्‍यक्‍त करने के लिए मेरे पास शब्‍द नहीं हैं..... 
मां। एक गजल जो मैं अक्‍सर सुनता हूं... उसे यहां रख  दे रहा हूं.... क्‍यों‍कि मुझे कोई शब्‍द नहीं सूझ रहे हैं तुम्‍हे व्‍यक्‍त करने को....। 

निदा फाजली जी की लिखी एक गजल पेश है.... 
 
बेसन की सौंधी रोटी पर खटटी चटनी जैसी मां
याद आती है चौका बर्तन चिमटा फुंकनी जैसी मां
 
बान की खुलरी खाट के ऊपर
हट आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी मां
 

बेसन की सौंधी रोटी पर खटटी चटनी जैसी मां
याद आती है चौका बर्तन चिमटा फुंकनी जैसी मां

चिडियों की चहकार में गूंजे
कभी मुहम्‍मद कभी अली
मुर्गे की आवाज से खुलती घर की कुंडी जैसी मां

बेसन की सौंधी रोटी पर खटटी चटनी जैसी मां
याद आती है चौका बर्तन चिमटा फुंकनी जैसी मां

बीवी बेटी बहन पडौसन
थोडी थोडी सी सबमें
दिन भर एक रस्‍सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां


बेसन की सौंधी रोटी पर खटटी चटनी जैसी मां
याद आती है चौका बर्तन चिमटा फुंकनी जैसी मां

बांट के अपना चेहरा माथा आखें
जाने कहां गई
फटे पुराने एक एलबम में चंचल लडकी जैसी मां
बेसन की सौंधी रोटी पर खटटी चटनी जैसी मां
याद आती है चौका बर्तन चिमटा फुंकनी जैसी मां


 


08 May 2012

...वरना नहीं मिलेगी माफी!


बारह साल। ढाई बार पीएससी परीक्षा! वह भी अधर में! छत्तीसगढ़ में सरकार की नाकामी का यह बड़ा उदाहरण है। साथ ही यह बताने के लिए भी काफी है कि यहां के युवाओं के लिए, बेरोजगारों के लिए सरकार कितनी सजग है। बड़ी-बड़ी बातें करने, रोजगार का अवसर सृजित करने का दावा अपनी जगह है लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार की कार्यप्रणाली इसी बात से साबित हो जाती है कि पीएससी जैसी संवैधानिक संस्था को सुचारू रूप से चलाया नहीं जा सक रहा है। ...और विपक्ष, वह भी इस गंभीर मामले को सामने में कमजोर साबित हो रहा है। 
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 315 कहता है कि अखिल भारतीय सेवाओं में भर्ती के लिए संघ लोक सेवा आयोग और राज्य सेवाओं में भर्ती के लिए राज्य लोक सेवा आयोग काम करता है। वर्ग एक के पद संघ लोक सेवा आयोग और वर्ग दो-तीन के पद राज्य लोक सेवा आयोग के माध्यम से भरे जाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका पालन ही नहीं हो रहा है और राज्य सरकार की इस नाकामी का खामियाजा राज्य के लाखों युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। राज्य लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक निकाय है और इस निकाय का सही ढंग से काम न करना राज्य सरकार के होने पर ही सवालिया निशान है! दुख की बात तो यह है कि इस मामले में विपक्ष भी नकारा साबित हो रहा है।  विपक्ष अपनी रोटी सेंकने में लगा है और सत्ता में बैठे लोग न जाने किस गलतफहमी में जी रहे हैं!
छत्तीसगढ़ राज्य को बने 12 साल हो गए। वर्ष 2000 में यह राज्य अस्तित्व में आया और इसके बाद पहली बार पीएससी की परीक्षा हुई 2003 में। बड़ी मुश्किल से इस परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों की भर्ती हो पाई। उन पर भी तलवार लटकी हुई है। भर्ती में गड़बड़ी की शिकायतें हुईं और मामला हाईकोर्ट में है। राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने इस मामले की जांच की है और जांच रिपोर्ट राज्यपाल के समक्ष पेश की जा चुकी है। इस ब्यूरो के सूत्रों की मानें तो जांच रिपोर्ट के आधार पर पचास से ज्यादा लोगों के पद बदल जाएंगे और कई को तो नौकरी से भी हाथ धोना पड़ जाएगा। दोष उन उम्मीदवारों का नहीं, आयोग का है, सरकार का है, जिसने परीक्षा लेने में, इसका परिणाम निकालने में गड़बड़ी की, लेकिन भविष्य अधर में उनका है जो इस परीक्षा के माध्यम से भविष्य संवारने का सपना देख रहे थे!
दूसरी बार परीक्षा हुई 2005 में। इसकी प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्य परीक्षा भी जैसे-तैसे निपटी और भर्ती प्रक्रिया भी पूरी हो गई लेकिन इस पर भी विवाद बना हुआ है। हां, इतनी राहत की बात जरूर है कि इस बार के चयनित उम्मीदवारों पर न्यायालय या जांच की तलवार नहीं लटकी है।
तीसरी बार परीक्षा 2008 में हुई। भर्ती में आरक्षण नियमों में का पालन नहीं होने को लेकर बवाल मचा और मामला न्यायालय में जा पहुंचा। बड़ी मुश्किल से चार साल बाद 2012 में इसकी मुख्य परीक्षा आयोजित हुई। रिजल्ट नहीं आया है और मामला सुप्रीम कोर्ट में जा पहुंचा है। राज्य की पीएससी ने इस परीक्षा में प्रारंभिक परीक्षा में ही आरक्षण के आधार पर परिणाम  जारी कर दिया, जबकि नियम कहता है कि है  एक से अधिक चरणों में होने वाली परीक्षाओं में आरक्षण नियमों का पालन अंतिम चरण की परीक्षा में किया जाना चाहिए।  इस तरह पीएससी में आरक्षण का नियम मुख्य परीक्षा में ही लागू होना चाहिए था। इस आधार पर मुख्य परीक्षा के परिणाम पर रोक का मामला सुप्रीम कोर्ट में है और इस पर क्या फैसला आएगा यह फिलहाल तय नहीं है। हालांकि बात यहां यह भी हो रही है कि मुख्य परीक्षा निरस्त होगी और नई चयन सूची के आधार पर फिर से मुख्य परीक्षा होगी। यानि यहां भी उम्मीदवारों से छल!
चौथी बार  परीक्षा 2012 में यानि इसी महीने की छह तारीख को हुई है। इस परीक्षा को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। आरोप लग रहे हैं कि छत्तीसगढ़ के उम्मीदवारों को वंचित करने का षडय़ंत्र रचा जा रहा है। उत्तरप्रदेश की भाषाशैली का प्रश्र पूछा गया है और वहां के ऐसे प्रश्र पूछे गए हैं जिनका जवाब वहां के उम्मीदवारों के लिए सरल और  छत्तीसगढ़ के उम्मीदवारों के लिए काफी कठिन हैं। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के ऐसे सवाल जिनका जवाब हर कोई दे सकता है।
छत्तीसगढ़ में जब पहली बार पीएससी की परीक्षा आयोजित हुई थी तो उस दौरान एक नियम पुस्तिका राज्य लोक सेवा आयोग ने जारी की थी, जिसमें स्पष्ट तौर पर उल्लेख था कि पीएससी की परीक्षा हर साल आयोजित होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। पड़ौसी राज्य मध्यप्रदेश जिससे अलग होकर छत्तीसगढ़ बना है, वहां हर साल यह परीक्षा  आयोजित हो रही है। छत्तीसगढ़ के साथ ही बने झारखंड और उत्त्तराखंड में भी यह परीक्षा सुचारू है। एक छत्तीसगढ़ ही है जहां पीएससी परीक्षा को लेकर पसीने छूट रहे हैं।
सैकड़ों, हजारों पद खाली हैं। राज्य में जिलों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन सरकार और पीएससी भर्ती ही नहीं कर पा रहा है। यह कमजोरी पीएससी की है। सरकार की है। इसका खामियाजा बेरोजगार भुगत रहे हैं। राज्य सेवा में आने की उम्मीद  लगाए युवा भुगत रहे हैं। रिटायर्ड लोगों को संविदा में लेकर सरकार तो अपना काम कर रही है लेकिन नई पीढ़ी के साथ जो अन्याय हो रहा है, उसका क्या। एक बात गौर करने वाली है कि व्यसायिक परीक्षा  मंडल जैसी संस्था जो संवैधानिक संस्था नहीं है, वह हर साल 50 हजार से एक लाख परीक्षार्थियों को लेकर परीक्षाएं आयोजित कर रहा है और उसका परिणाम भी समय पर जारी कर रहा है। इसे लेकर कोई विवाद भी नहीं हो रहा है, लेकिन एक संवैधानिक संस्था का छत्तीसगढ़ में इस तरह का हाल..... राज्य की युवा पीढ़ी के भविष्य से खिलवाड़ है। .... और फिर राज्य सरकार विकास के, तरक्की के, बेहतरी के कितने ही दावे कर ले, मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी उसे कभी माफ नहीं करेगी।

05 May 2012

‘यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला...!’


सुकमा कलेक्‍टर एलेक्‍स पाल मेनन
 ‘फक्र है हमें कि हमने अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए अपनी जान दे दी। हम एक पल भी नहीं डिगे और हमने वो काम अपनी आखिरी सांस तक करने की कोशिश की, जो हमें मिला था। जब तक हम जिंदा थे, जब तक हमारे शरीर में ताकत थी, हम डटे रहे और अपने साहब के लिए ढाल बने रहे। नक्सलियों ने उस समय तक हमारे साहब को छूने की भी हिम्मत नहीं दिखाई जब तक हम उनके साथ थे। हमारी जान गई और नक्सलियों ने हमारे साहब का अपहरण कर लिया। .....पर ये क्या? नक्सलियों के चंगुल से छूटने के बाद हमारे साहब ने हमारे बारे में बात ही नहीं की। जानने की कोशिश ही नहीं की कि हमारे बाद हमारे परिवार का क्या हाल है? यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला....!

किशन कुजूर और अमजद खान। ये दो सैनिक थे जो 21 अप्रैल की दोपहर तीन बजे तक की स्थिति में जीवित थे। इस समय तक ये अपने कलेक्टर, जिनकी सुरक्षा में तैनात थे, को लेकर पूरी तरह सजग थे। समर्पित थे। यही भाव लिए वो तीन बजे के बाद निर्जीव हो गए। शहीद हो गए। नाम ऊंचा कर गए अपने परिवार का। अपनी जमात का। इस दुनिया के बाद कहीं स्वर्ग का अस्तित्व है, जन्नत का अस्तित्व है तो वहां से भी ये दोनों 21 अप्रैल की शाम से लेकर तीन मई की शाम तक यही दुआ करते रहे होंगे कि उन लोगों की जान भले ही चली गई पर उनके साहब को कुछ नहीं होना चाहिए। उन लोगों ने जो कुर्बानी दीवह व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। उनके साहब सकुशल घर लौट आएंगे।
किशन और अमजद की इस दुनिया से परे की गई दुआएं काम कर गईं और उनके साहब घर लौट आए। नक्सलियों ने किसी अघोषित सौदे(?) की प्रत्याशा में सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन को रिहा कर दिया। गुरूवार को एलेक्स पाल मेनन पहले ताड़मेटला से चिंतलनार पहुंचे। चिंतलनार में उन्होंने मीडिया से संक्षिप्त बात की। इस बात में उन्होंने सरकार, अपने बड़े अफसरों, अपने परिवार और मीडिया को धन्यवाद ज्ञापित किया। वे दूसरे दिन सुकमा में पत्रकारों से बात करने की बात कहकर निकल गए। दूसरा दिन भी आ गया। कलेक्टर अब बंगले में पहुंच गए थे। जंगल में तो नहीं थे। नक्सलियों के कब्जे में तो नहीं थे, जो सामान्य रहते। कलेक्टरी का रूतबा हावी हो गया। बंगले के भीतर गए तो बाहर ही नहीं निकले। उनके बंगले के बाहर उनसे बात करने, उनके नक्सली चंगुल में रहने के दौरान के अनुभव जानने, उनकी रक्षा करते जान गवां चुके दो सुरक्षा गार्डों पर सवाल करने की उम्मीद से मौजूद मीडिया को एसडीएम ने कलेक्टर का संदेश सुनाया कि कलेक्टर साहब की तबियत ठीक नहीं, वो बात नहीं कर सकेंगे! सुकमा में कलेक्टर बंगले के बाहर अपने न्यूज चैनल के लिए ड्यूटीमें तैनात एक पत्रकार का कहना था कि वो कलेक्टर से पूछना चाहते हैं कि उन गार्डों का क्या कसूर जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। पर पूछें किससे....? और क्या पूछने की जरूरत होनी चाहिए? कलेक्टर को खुद होकर पूछताछ करनी चाहिए थी और अपने गार्डों के परिवारों का हाल जानना चाहिए था।
कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन रिहा हो गए। सच में यह वक्त काफी राहत पहुंचाने वाला था। मेनन के परिवार वालों के लिए, मेनन के लिए, सरकार के लिए और सरकार के लिए काम करने वाले मध्यस्थों, नक्सलियों के वार्ताकारों के लिए, लेकिन यह वक्त इस कदर जश्र मनाने का कतई नहीं था कि किसी की शहादत को भूला दिया जाए। पटाखे फोड़े जाने वाली बात तो नहीं थी। मिठाईयां बांटे जाने का वक्त तो नहीं था। एलेक्स के पिता हैं, उनका परिवार है, क्या उनको यह सामान्य समझ नहीं कि किशन कुजूर का भी परिवार होगा? अहमद खान का भी परिवार होगा? उनका बेटा तो लौट आया, पर क्या किशन और अमजद कभी लौट पाएंगे!
किशन और अहमद खुद कहीं होंगे, इस दुनिया से परे तो कल रिहा होने के बाद अपने साहब की बेरूखी और साहब के चाहने वालों के जश्न को देखकर जरूर आपस में यह बात कर रहे होंगे कि, यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला...!

03 May 2012

क्या समझौता? कैसी शांति? कैसी रिहाई?


सरकार ढोल पीट रही है कि उसने सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन की रिहाई का रास्ता आखिर तय कर लिया। सब कुछ ठीक रहा तो गुरूवार को मेनन सुरक्षित अपने घर भी आ जाएंगे, पर उनका क्या जो गए तो थे नक्सल मोर्चे पर अमन शांति कायम करने की उम्मीद के साथ और घर उनका निर्जीव शरीर लौटा! इस वक्त भी जब सरकार खुशी से फूले नहीं समा रही है, कि उसने कलेक्टर को सुरक्षित लाने में सफलता हासिल कर ली, नक्सलियों ने लाशें बिछाने में देरी नहीं की। क्या जवानों का कसूर सिर्फ इतना है कि वे मामूली जवान हैं, आईएएस जैसा ओहदा उनके साथ नहीं है? कहां हैं, वे लोग जिन लोगों ने कलेक्टर की रिहाई के लिए कैंडल मार्च किया? रैलियां निकालीं? प्रार्थनाएं कीं? कहां हैं? अफसोस.......!
क्या कर रहे हैं, वे मध्यस्थ जो नक्सलियों का दूत बनकर आए? क्या उन लोगों ने जो मसौदा तैयार किया उसमें ऐसा कुछ था कि कलेक्टर रिहा होना चाहिए, चाहे कुछ भी कीमत लगे? बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं बीडी शर्मा और जी हरगोपाल, सरकारी मेहमान बनकर बैठे हैं सुयोग्य मिश्र और निर्मला बुच। क्या उन लोगों ने ऐसा कुछ ही तय किया था कि कलेक्टर की रिहाई होनी चाहिए, बस! अफसोस.......!
मंगलवार को जब मुख्यमंत्री ने कहा था कि 48 घंटे में कलेक्टर रिहा हो जाएंगे। किसी नक्सली को नहीं छोड़ा जाएगा।  हां, विचाराधीन नक्सली बंदियों को लेकर हाईपावर रिव्यू कमेटी बनाई जाएगी। ... और इस पर जब नक्सलियों के दोनों दूतों ने सहमति जताई थी तो लगा था कि अब नक्सल आतंक से छत्तीसगढ़ को मुक्ति मिल सकती है। एक बेहतर प्रयास हो रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार के इस कदम की हमने सराहना भी की थी, और ऐसा लगा था कि एक नई शुरूआत हो रही है, लेकिन! अफसोस......!
नक्सलियों ने इस सहमति की स्याही भी नहीं सूखी, अपनी औकात दिखा दी है। बस्तर के बचेली के साप्ताहिक बाजार में नक्सलियों की गोली से दो जवानों की मौत हो गई। क्या यही समझौता हुआ था, सरकार और नक्सलियों के दूतों के बीच! क्या समझौता सिर्फ कलेक्टर तक सीमित था? जवानों और आम लोगों की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है? अफसोस.....!
सुकमा के अगवा कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन गुरूवार को नक्सली चंगुल से आजाद हो जाएंगे। एक बड़ा सवाल चर्चा में है, कि ऐसा क्या जादू हुआ कि कलेक्टर का अपहरण कर सरकार को बेकफुट पर लाने वाले नक्सली अचानक खुद क्यों बेकफुट पर आ गए? कल तक जो सरकार नक्सलियों के सामने मिमियाती नजर आ रही थी, वह अचानक दहाडऩे कैसे लगी? नक्सलियों ने कलेक्टर का अपहरण कर पहले अपने आठ साथी मांगे, फिर संख्या बढ़कर 17 हुई और फिर 80 के आसपास पहुंची। एक नक्सली भी रिहा नहीं हो रहा है और नक्सली नेता ने एसएमएस कर कहा है कि गुरूवार को वे कलेक्टर को छोड़ रहे हैं! यह चमत्कार कैसे हुआ?
अब जब मेनन रिहा होने वाले हैं और नक्सल वारदातें नहीं थमी हैं, ऐसा लग रहा है, कहीं यह सब सोझी समझी 'स्क्रिप्ट' का हिस्सा तो नहीं! कहीं ऐसा तो नहीं कि नक्सलियों ने किसी बड़े सौदे की प्रत्याशा में कलेक्टर का पहले अपहरण किया और इसी की अगली कड़ी हो कलेक्टर की रिहाई! नक्सली कल जन अदालत लगाएंगे और जन अदालत में कलेक्टर को छोडऩे का फैसला लेंगे... यदि यह खबर सही है तो अभी से कलेक्टर को रिहा करने की बात कैसे आई? फैसला तो जन अदालत में होना है!
बेहतर हो, ऐसा न हो। वरना छत्तीसगढ़ में नासूर बन चुका नक्सलवाद शायद ही कभी थमें। सरकारें  अपने फायदे के लिए नक्सलियों से समझौता करती रहें और इस आग में आम आदिवासी, आम आदमी, आम पुलिस वाला झुलसता रहे तो किसी दिन पूरा छत्तीसगढ़ श्मशान बनकर रह जाएगा और फिर क्या समझौता? कैसी शांति? कैसी रिहाई?