...और नक्सली घटनाएं हो रहीं हैं। एक तरफ सरकार नक्सलियों से बात करने का दावा कर रही है। सरकार की बनाई हाईपावर कमेटी नक्सलियों की रिहाई के रास्ते तलाश करने में जुटी है तो दूसरी ओर नक्सली बुलेट का साथ छोड़ ही नहीं रहे हैं। रविवार को मदर्स डे था। मदर्स डे के दिन कई मांओं की गोदें सूनी हो गईं। ये कैसी बातचीत है? ये कैसी शांति है?
छत्तीसगढ़ किस दिशा में जा रहा है। नक्सली एक कलेक्टर को उठाकर ले जाते हैं। पूरा प्रदेश, पूरा देश हिल जाता है। सरकार नक्सलियों के सामने गिड़गिड़ाती नजर आती है। करीब पखवाड़े भर हाईप्रोफाइल ड्रामा चलता है। दिगर जगहों से आयातित कर वार्ताकार बुलाए जाते हैं। ये वार्ताकार नक्सलियों की मांद तक पहुंच जाते हैं। सरकार नहीं पहुंच पाती। सरकार के सुरक्षा बल नहीं पहुंच पाते। आम आदमी जानना चाहता है आखिर छत्तीसगढ़ में किसकी सरकार है?
क्या आम छत्तीसगढिय़ा ये मान ले कि उसे दो सरकारें मिली हैं। एक सरकार जो बैलेट के माध्यम से आई है और दूसरी सरकार जो बुलेट से चल रही है। बस्तर के कुछ इलाकों में बैलेट के जरिए आने वाली सरकार मेमने की तरह होती है। जंगल में शेर की तरह यहां का राजा बुलेट के जरिए सरकार चलाता है। संघ के समय से भगवा पार्टी में रहे और अब भाजपा से किनारा कर चुके एक नेता व्यंग्य करते हैं कि बस्तर में नक्सली हमले के बाद मुख्यमंत्री आवास की दीवारें कुछ इंच ऊंची कर दी जाती हैं! मुख्यमंत्री और उनके सिपहसलार इस व्यंग्य पर खामोश क्यों हैं?
बड़ी खामोशी से नक्सली एक सलवा जुड़ूम कार्यकर्ता की हत्या कर देते हैं। पहले उसका अपहरण करते हैं। फिर जन अदालत लगाते हैं। उसी सुकमा में जहां हाईप्रोफाइल ड्रामा खेला गया था। न कहीं कोई मोमबत्ती जलती है। न कहीं कोई रैली निकलती है। जी हरगोपाल, ब्रम्हदेव शर्मा, निर्मला बुच और सुयोग्य मिश्र भी नजर नहीं आते। सब अपने घरों में इस गरमी के मौसम में एयरकंडीशंड कमरों में आराम कर रहे होते हैं। पुनेम पोदिया एक आम इंसान था। कोई आईएएस थोड़ी था जिसके लिए ये लोग धूप में जंगल की खाक छानते। मीडिया को भी पूनेम पोदिया कोई टीआरपी नहीं देता! इसलिए मीडिया भी आराम के मूड में थी। जाहिर है, एक आईएएस के अपहरण और रिहाई के बीच मीडिया को एक ‘सुपर टीआरपी’ मामला मिल गया था, जब तक यह चला भुनाते रहे सब! खत्म हुआ तो सब लौट गए अपने ठिएं में, मानो कुछ दिन की पिकनिक मन गई! मीडिया के लिए यह ‘रोमांचक कव्हरेज’ था लेकिन शायद ही कोई समझ सकता है कि बस्तर के लोगों के लिए उनका रोमांच हर दिन के जीने मरने जैसा है। बात हो रही थी, पुनेम पोदिया की। बेचारा फरवरी महीने से नक्सलियों के चंगुल में था। इस बीच के ड्रामे में इसका कहीं नाम नहीं आया। इसका यही हाल होना था। हो गया। मारा गया। उधर एक के बाद एक नक्सलियों की रिहाई की कोशिशें हो रही हैं। नक्सली वारदात पर वारदात कर रहे हैं। सरकार शहीदों के शवों के लिए तिरंगे का आर्डर देने में ही लगी है! क्या उसका जमीर नहीं जगता?
बैलाडीला में जो सात जवान मारे गए, वो कौन थे? आम सिपाही। एक एएसआई गोलियों से भून दिया गया। उनकी मौत का किस पर असर पड़ा है। उन जवानों की मां, बहन, बच्चे, पिता पर। नक्सलियों से बातचीत चल रही है। रिहाई के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में इनका जाना क्या सरकार की कमजोरी और नक्सलियों की दादागिरी नहीं है? हर हादसे के बाद हादसे की निंदा का रटा-रटाया बयान जारी कर प्रदेश के मुखिया क्या अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं? क्या उनकी घटना की निंदा कर देने से जवान जिंदा लौट आ सकते हैं?
कब तक? आखिर कब तक? इस तरह की नक्सल वारदातें कब तक छत्तीसगढ़ को रूलाती रहेंगी? कब तक मांओं की गोदें सूनी होते रहेंगी? कब तक बहनें अपने भाईयों की कलाई के लिए तरसेंगी? कब तक एक पिता अपने बेटे की लाश को कांधे पर ढोने मजबूर होता रहेगा? कब तक कोई अबोध बच्चा अपने पिता के शव के आसपास लोगों को रोते देखते हुए सहमा सा रहेगा? कब तक हम इस तरह के हादसे के बाद अफसोस जाहिर कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएंगे? क्या खून नहीं खौलता हमारा? या फिर इंतजार उस दिन का है जब हर घर में एक शहीद हो? क्या सरकार को शर्म नहीं आती? क्या सारे सवालों का जवाब किसी के पास है?????????




